गुरु बिन ज्ञान न होवे (भाग- 2 )
गुरु बिन ज्ञान न होवे (भाग- 2 )
यस्य पाश वेर्य गुरुर्नास्ति जिव्हां ह्रदय स्पंदनं
रक्त कणे क्षणे श्वासं ह शिष्यः नास्ति कथ्येत ।।
शास्त्रों में कहा गया है
जिसके पास गुरु नहीं होता ,जिसने अपने गुरु को धारण नहीं किया ,जिसने अपनी जिव्हा से गुरु के नाम का उच्चारण नहीं किया ,वह सही अर्थो में ,तुच्छ ,अधम,और निगुरा है ,क्योकि जीवन मल-मूत्र भरी काया ही है !
जिससे वह ,जीवन में दुःख प्राप्त करता हुआ ,कष्ट पता हुआ ,घिसट-घिसट कर आगे बढ़ता रहता है !
जिसकी जिव्हा पर "गुरु"शब्द नहीं है ,जिसके ह्रदय में गुरु स्थापित नहीं है ,वह ह्रदय श्मशान की तरह है ,जो की अपने आप में मृत्युवत कहा जा सकता है ,!जिसके स्पंदन में गुरु की चेतना नहीं है ,वह मनुष्य "शिष्य" कहलाने योग्य ही नहीं है ,वह तो निम्न योनि के अंतर्गत ही गिना जा सकता है I
जिसके रक्त के कण-कण में गुरु स्थापित नहीं है ,वह अपने आप को किस मुँह से शिष्य कह सकता है ?
क्योकि स्वच्छ और रोग रहित रुधिर वही हो सकता है जिसके अंदर ,जिसके कण-कण में गुरु स्थापित होता है ,और जो प्रत्येक श्वास के साथ ,चाहे वह पूरक हो या रेचक हो (श्वास लेते समय और निकलते समय ) दोनों स्तिथियो में गुरु स्मरण नहीं करता ,उसको किसी भी स्थिति में शिष्य नहीं कहा जा सकता I
जिस प्रकार से नदी समुद्र में समां जाती है और समुद्रवत बन जाती है ,जिस प्रकार एक बेल वृक्ष से लिपट कर ऊंचाई पर पहुंच जाती है ,ठीक उसी प्रकार ,शिष्य अपने जीवन में गुरु को उतार कर ,अपनी धड़कनो में गुरु को समाहित कर ,अपने रक्त के कण-कण में गुरु को स्थापित कर पूर्णता को प्राप्त कर लेता है ,और उसका जीवन स्वर्णिम बन जाता है ,दिव्य बन जाता है ,चेतना युक्त बन जाता है और वो द्वितीय बन जाता है ! ऐसा ही शिष्य सही अर्थो में पूर्णता प्राप्त करने का अधिकारी होता है ,ऐसा ही शिष्य जीवन में सब कुछ प्राप्त करने में सक्षम होता है ,और ऐसा ही शिष्य जीवन की पूर्णता को समझ सकता है I

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