गुरु बिन ज्ञान न होवे (भाग - 1 )
गुरु बिन ज्ञान न होवे (भाग - 1 )
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरा
गुरु साक्षात् परम ब्रह्मा तस्मै श्री गुरवे नमः.
संसार में केवल गुरु ही इस नाशवान शरीर और अपूर्ण जीवन को परुन्तै प्रदान करने में समर्थ है !
यह जीवन प्राण ,यह चेतना ,यह रुधिर और इस रक्त के कण-कण में ,ह्रदय की धड़कन में केवल गुरु का समावेश ही शास्त्रोचित है ,क्योकि ,गुरु के द्वारा ही यह जीवन पूर्णता प्राप्त करता ही ,गुरु के द्वारा ही चौरासी लाख योनियों से एक जीव छुटकारा पा सकता है ,गुरु की कृपा से ही जीवन में ज्ञान और विज्ञानं में परिपूर्ण हो सकता है और गुरु के द्वारा ही इस नाशवान श्मशानवत जीवन और संसार को पार कर सिद्धाश्रम में प्रवेश पा सकता है I
क्योकि गुरु कोई एक नाम नहीं है ,केवल एक शरीर नहीं है ,गुरु तो समस्त जीवन की चेतना है ,एक स्पंदन है ,प्राणो की पूर्णता है ,एक उच्तता है ,एक दिव्यता है ,क्योकि इस कलियुग में गुरु दृश्यमान देवता है ,जहाँ अन्य देवी-देवता कल्पना में है ,मूर्तिवत ,पाषाणवत है ,वहां गुरु साक्षात् स्पंदन युक्त है ,जो की कृपा पूर्वक अपने शिष्यों को सभी दृष्टियों में पूर्णता दे सकते है I
जब गुरु को हमने प्राप्त कर ही लिया ,तो फिर जीवन में किसी प्रकार की न्यूनता रह ही नहीं सकती ,क्योकि बाकि सारी चीजें नाशवान है
यदि पूर्णता शब्द किसी के साथ लागू हो सकता है तो वह केवल "गुरु" शब्द है ,और ऐसे गुरु के चरणों को स्पर्श कर जो उनसे लिपट जाता है,उसका जीवन अपने आप में धन्य हो जाता है ,,और यह सब हो सकता है ,तुम्हारे कार्यो से ,तुम्हारे विचारो से ,तुम्हारी भावनाओ से ,तुम्हारे चिंतन से तब गुरु प्रसन्न होते है ,और तुम्हारे ह्रदय में उतर जाते है ।
ऐसे शिष्य ही सही और पूर्ण शिष्य कहलाने के योग्य होते है I
( क्रमशः )
- स्वामी श्रेयानन्द
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