*अध्यात्म ही जीवन का आनन्द .....*
धर्म दर्शन ( भाग - 3)
*अध्यात्म ही जीवन का आनन्द .....*
:: धर्म दर्शन ( भाग - 3) ::
प्रकृति का नियम है जीवित रहना है तो जीव को प्रतिस्पर्धा , संघर्ष करना ही होगा । कभी प्रकृति के साथ तो कभी अपने समुदाय के साथ । फिर चाहे वजूद के लिए हो या फिर श्रेष्ठता के लिए ।
इसी प्रतिस्पर्धा में हम कितने भी सफल क्यों न हो ... फिर एक दिन अवसाद में रहकर निराशा का दामन थाम लेंगे । और जीवन का आनन्द कही कुचल कर रह जाएगा ।
हमारे सनातन धर्म मे ऋषियों ने आध्यात्म को मानसिक आनन्द का रूप माना है। वह आनन्द जो सुख दुख सभी परिस्तिथियों में हमारे साथ और पास ही रहता है ।
आनन्द कहीं पहाड़ों में , गुफाओं में या कन्दराओं में नही रहता । आनन्द को कहीं ढूंढा नही जा सकता । वह तो हम सबके विचारों में हमेशा विद्यमान रहता है । बस हमे उसे प्राथमिकता देने की जरूरत है.... फिर वह निरन्तर प्रवाहित होता है हमारी सांसो में , धड़कनो में ।
आनन्द की अनुभूति हमे कौन कराएगा , कौन बताएगा मार्ग ? विद्यालय हमे शिक्षित कर देंगे, परिवार हमे जीविकापार्जन का मार्ग बता देंगे पर आनन्द का मार्ग नही।
इसके लिए फिर हमें महावीर के पास जाना होगा, किसी बुद्ध के पास बैठना होगा । तुम्हारे भीतर आनन्द की ज्योत वही जला सकता है जो स्वयम आनन्दित हो । जो दिया जला होता है वही दूसरे दिये को जला सकता है ।
इस महाशिवरात्रि में आपके जीवन मे भी कोई ऐसा व्यक्तित्व मिले जिसके अंदर आनन्द का ज्योत जला हो, और वह सक्षम हो जो दूसरे के अंदर भी आनन्द की ज्योत जला सके ।
जीवन के किसी भी उम्र में ऐसा कोई व्यक्तित्व मिले तो उसके साथ जुड़ जाना , उसकी उम्र, उसकी काया पर मत जाना , उसके ज्ञान को अपनी बुद्धि से मत तौलना , तुम्हारा जीवन आनन्द ओतप्रोत हो जाएगा ....
इन्ही शुभकामनाओ के साथ ....
महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं ...
सदैव आपके साथ -
स्वामी श्रेयानन्द महाराज
मोब. 09752626564
Comments
Post a Comment